शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के माली होते हैं।वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं, तथा अपने श्रम से उन्हें सींच – सींचकर महाप्राण शक्तियां बनाकर पुष्पित, पल्लवित करते हैं। शिक्षकों द्वारा किए गए श्रेष्ठ कार्यों का यथोचित मूल्यांकन कर, उन्हें सम्मानित करने का दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा समूचे जगत में हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति महामहिम सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस को अक्षुण्ण बनायें रखने,साथ ही उनके पदचिन्हों, आदर्शों को अमल करने की प्रेरणा देता है।
प्राचीनकाल से गुरु – शिष्य परंपरा यूं चलती आ रही है। शिक्षक दिवस मनाने का मूल उद्देश्य राष्ट्र निर्माता कहे व माने जाने वाले शिक्षकों को उचित सम्मान मिले,साथ ही शिष्यों को उनके द्वारा सही मार्गदर्शन मिले। अनुशासन, कर्त्तव्यपरायणता,दृढ़ संकल्पित होकर लक्ष्य की ओर बढ़ने का जज्बा अगर शिष्य में शिक्षक सृजित करें तो वहीं आदर्श शिक्षक कहलाता है। ज्ञान के मंदिर में शिक्षक उस मोमबत्ती के समान है,जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाशवान करता है। शिक्षक वह है,जो पाषाण से कठोर मानव को भी मोम की भांति मुलायम बना सकने का सामर्थ्य रखता है। शिक्षक विद्यार्थियों में संस्कारों के बीज बोते हैं,साथ ही अज्ञानता के तम को दूर कर ज्ञान दीप आलोकित कर जीवन को उजियारा करते हैं, भविष्य उज्जवल बनाते हैं। शिक्षक ही अपने ज्ञान के माध्यम से अपने शिष्यों में संयम, संवेदना, सहानुभूति, सौहार्द भाव सृजित करते हैं। नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। नैतिक मूल्यों पर आधारित आदर्शों का अनुसरण करने की सीख देते हैं। बच्चों के व्यक्तित्व को संवारने में महती भूमिका निभाते हैं। बच्चों को एक आदर्श इंसान,जागरूक नागरिक, तथा जिम्मेदार मनुष्य बनाने का कार्य शिक्षक ही करता है। शिक्षक समाज के दिव्य प्रकाश स्त्रोत होते हैं।वे ज्ञान एवं चेतना की एक अवस्था विशेष के दिव्य प्रतीक होते हैं।अनगढ़ व्यक्तित्व में सुधार, संभालकर मौलिक एवं आत्मिक रूप से परिपूर्ण करने में अपना मौलिक योगदान देते हैं। साधारण से छात्र को अत्यंत प्रतिभावान शोधार्थी के रूप में गढ़ देने की विशेषज्ञता शिक्षक में होती है।
शिक्षक ज्ञान का समुद्र होता है, जिसमें कला- कुशलताएं उददाम लहरों की भांति उफनती – उमड़ती रहती है।वह शिक्षार्थी के जीवन में इन कुशलताओं की बाढ ला देता है।वह उसे असाधारण प्रतिभा से निष्णात एवं पारंगत कर देता है।इस प्रकार शिक्षक ज्ञान का, कुशलता का बोध कराता है।
शिक्षक शिष्य को बोधिसत्व बना देता है।आज समूचे जगत में जो भी उच्च पद पर आसीन हैं चाहे वो सेना में हों या प्रशासनिक अधिकारी हों, डाक्टर हों या इंजीनियर किसी भी क्षेत्र में मुकाम हासिल किए हों उन सबने शिक्षक से ही ज्ञान प्राप्त किया है। शिक्षक ही उनके मार्गदर्शक, प्रेरणापुंज, आदर्श व आधारस्तम्भ जाने जाते हैं।
अंत में मैं अपनी लेखनी के माध्यम से अपने सारे शिक्षकों को जिन्होंने मुझे पढ़ाया, ज्ञान दिया, जिसके बलबूते मैं जिस मुकाम पर हूं,अपनी काबिलियत अपनी प्रतिभा का सारा श्रेय आदरणीय शिक्षकों को समर्पित करती हूं।
डॉ. मनीषा त्रिपाठी प्रधानपाठक राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित
शास. रविशंकर प्राथमिक शाला
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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