रायपुर-
गांव के चौक-चौराहों से लेकर शहर की छोटी दुकानों तक, आजकल एक ही चर्चा सुनाई देती है—प्लास्टिक पर सख्ती और शराब की बोतलों में ढील। जहां एक ओर सरकार छोटे दुकानदारों, पान ठेला संचालकों और चाय वालों को प्लास्टिक डिस्पोजल इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के निर्देश दे रही है, वहीं दूसरी ओर शराब की बिक्री में कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक (PET) बोतलों का बढ़ता उपयोग लोगों को हैरान कर रहा है।यह सवाल अब सिर्फ दुकानदारों का नहीं रहा, बल्कि आम जनता के बीच भी गूंजने लगा है अगर प्लास्टिक सच में नुकसानदेह है, तो फिर एक जगह सख्ती और दूसरी जगह छूट क्यों?
पर्यावरण की चिंता या नीति का विरोधाभास?
सरकार का तर्क साफ है—सिंगल यूज प्लास्टिक से पर्यावरण को खतरा है। लेकिन हकीकत यह भी है कि शराब की प्लास्टिक बोतलें अब बड़ी मात्रा में कचरे का हिस्सा बन रही हैं।
नालों में बहती, खेतों में बिखरी और नदी किनारों पर पड़ी ये बोतलें धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक में बदलकर जमीन और पानी दोनों को प्रभावित कर रही हैं।स्थानीय लोगों का कहना है—“जब चाय के लिए प्लास्टिक ग्लास बंद हो सकता है, तो शराब के लिए क्यों नहीं?”
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ा है, जो शायद कभी चर्चा में नहीं आते—कबाड़ी, कचरा बीनने वाले, और छोटे स्तर पर बोतल खरीदने-बेचने वाले लोग।पहले कांच की खाली बोतलें उनके लिए आय का जरिया थीं। हर बोतल की कीमत मिलती थी, जिससे रोज का खर्च चलता था।अब प्लास्टिक बोतलों में वह कीमत नहीं है, न ही उतनी मांग।एक कबाड़ी ने बताया—“पहले बोतल से घर चलता था, अब प्लास्टिक में कुछ बचता ही नहीं।”
सरकार के इस फैसले के पीछे कुछ वजहें भी बताई जा रही है कांच की बोतलों से होने वाली हिंसा को रोकना,नकली शराब पर नियंत्रण,परिवहन और लागत को कम करना ,ये कारण अपने आप में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन फैसलों में पर्यावरण और गरीबों के रोजगार को बराबर तवज्जो मिली?
जनहित में सक्रिय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नीति में एकरूपता जरूरी है।अगर प्लास्टिक हानिकारक है, तो हर क्षेत्र में उस पर समान नियम लागू होने चाहिए।साथ ही, कांच की बोतलों की वापसी से न केवल पर्यावरण को राहत मिलेगी, बल्कि हजारों लोगों का रोजगार भी फिर से पटरी पर आ सकता है।यह मुद्दा सिर्फ बोतलों का नहीं है। यह उस संतुलन का सवाल है, जहां विकास, सुरक्षा, पर्यावरण और रोजगार—चारों को साथ लेकर चलना जरूरी है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस आवाज को सुनती है या नहीं। क्योंकि जब सवाल आम लोगों की रोजी-रोटी और आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरण का हो, तो जवाब भी उतना ही जिम्मेदार होना चाहिए।







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