February 8, 2026

वंदेमातरम् कहने वाली वह आवाज़ स्मृतियों में आज भी ज़िंदा है -शुभम दुबे

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सारंगढ़ बिलाईगढ़ – देवेन्द्र केशरवानी-एक ऐसा नाम जो आज भी स्मृतियों में आते ही एक हसमुख, सरल और आत्मीय चेहरे को सामने ले आता है। एक ऐसा चेहरा, जो हर मुलाक़ात में मुस्कान के साथ हाथ जोड़कर “वंदेमातरम्” के साथ अभिवादन करता था । द्वितीय पुण्यतिथि पर यह एहसास और गहरा हो जाता है कि कुछ लोग देह से विदा हो जाते हैं, पर अपने स्वभाव, संस्कार और विचारों के कारण समाज के भीतर जीवित रहते हैं। सरसींवा ही नहीं, पूरे अंचल में वे केवल एक पत्रकार नहीं थे, बल्कि भरोसे, साहस और संवेदनशीलता का जीवंत प्रतीक थे।
देवेंद्र केशरवानी उन दुर्लभ लोगों में थे, जिनके विचार उनके आचरण से अलग नहीं थे। “वंदेमातरम्” उनके लिए औपचारिक अभिवादन नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि थी-राष्ट्र, समाज और सत्य के प्रति निष्ठा की उद्घोषणा थी । इसी भाव ने उनकी पत्रकारिता को दिशाहीन नहीं होने दिया। संघ से जुड़कर उन्होंने राष्ट्र सेवा को हमेशा सर्वोपरि रखा । स्मृतिशेष देवेंद्र केशरवानी सरसींवा के प्रतिष्ठित व्यवसायी एवं वरिष्ठ भाजपा नेता शिवरात्रि केशरवानी तथा प्रमिला केशरवानी के सुपुत्र थे। 25 जनवरी 1978 को मुच्छमल्दा के केशरवानी परिवार में जन्मे देवेंद्र केशरवानी में सामाजिकता और मिलनसारिता बचपन से ही रची-बसी थी। वे कभी ऊँची आवाज़ में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराते थे, बल्कि अपने व्यवहार से हर मन में स्थान बना लेते थे। बचपन से ही उनमें समाज के प्रति जुड़ाव, संवाद की सहजता और दूसरों के दुःख को अपना मानने का भाव स्पष्ट दिखाई देता था। वे भीड़ में अलग दिखने के लिए प्रयास नहीं करते थे, बल्कि अपने आचरण से स्वयं अलग पहचान बना लेते थे। क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार के रूप में उन्होंने पत्रकारिता को एक नई दिशा और दृष्टि दी। 2005 में पत्रकारिता की विधिवत शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर से 2008–09 में एलएलबी की डिग्री अर्जित कर उन्होंने अपने ज्ञान को समाज के हित में लगाया। व्यवसाय के साथ-साथ समाजसेवा में सक्रिय रहते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि कलम केवल लिखने का साधन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का माध्यम भी है। देवेंद्र केशरवानी उस दौर के पत्रकार थे, जब कलम बिकाऊ नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी हुआ करती थी। वे बिना शोर किए, बिना सनसनी फैलाए, ठोस तथ्यों के साथ मुद्दे उठाते थे। क्षेत्र की समस्याएं-चाहे वे आम नागरिक से जुड़ी हों या प्रशासनिक उदासीनता से-उनकी लेखनी का विषय बनती थीं। वे न तो सत्ता से भयभीत थे और न ही सच लिखने से पीछे हटने वाले। उनकी लेखनी में जीवटता थी-ऐसी जीवटता जो सत्ता से नहीं, सच से ताक़त लेती थी। क्षेत्र की समस्याओं को उठाना, आमजन की पीड़ा को शब्द देना और समाधान की दिशा में समाज को जागरूक करना उनका स्वभाव था। वे सच्चाई और 'राष्ट्र प्रथम' के सिद्धांत के साथ अडिग होकर खड़े रहने वाले पत्रकार थे। इसी कारण आज भी उनका नाम क्षेत्र में पत्रकारिता जगत के एक आधार स्तंभ के रूप में आदर के साथ लिया जाता है। 07 फरवरी 2024 वह काला दिन रहा जिस दिन एक सड़क दुर्घटना में क्षेत्र ने अपना एक अनमोल हीरा खो दिया। यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि उस पत्रकारिता का मौन हो जाना था, जो बिना लाग-लपेट के सच बोलती थी। फिर भी, देवेंद्र केशरवानी की लेखनी, उनकी जीवटता और उनका जीवन-दर्शन आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि पत्रकारिता के एक सशक्त अध्याय का असमय अंत था। द्वितीय पुण्यतिथि पर यह नमन उसी हसमुख व्यक्तित्व को है, जिसने पत्रकारिता को संवेदना दी, समाज को दिशा दी और हर मुलाक़ात को "वन्देमातरम" के राष्ट्रभाव से जोड़ा। देवेंद्र केशरवानी स्मृति नहीं, प्रेरणा हैं-और प्रेरणाएं कभी विदा नहीं होतीं।