जिनके लिए राजनीति सत्ता नहीं, समाज और जनसेवा का माध्यम थी
सारंगढ़/बिलाईगढ़। सारंगढ़ अंचल के जनजीवन और सामाजिक सरोकारों में अपनी अलग पहचान बनाने वाले पूर्व विधायक स्वर्गीय श्री भैयाराम खुटे जी का स्मृतिदिवस आज श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जा रहा है। उनका जीवन केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष, सादगी, जनसरोकार और समाज के प्रति समर्पण की प्रेरणादायक कहानी के रूप में याद किया जाता है।
उपलब्ध प्रकाशित जीवन-वृत्तांतों के अनुसार, स्व. भैयाराम खुटे जी का जन्म 11 नवंबर 1950 को सारंगढ़ क्षेत्र के ग्राम खुड़ुभाठा में एक कृषक परिवार में हुआ था। ग्रामीण परिवेश और सामान्य जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखने के कारण वे समाज के अंतिम व्यक्ति की समस्याओं को समझने वाले जननेता के रूप में विकसित हुए।
पंचायत से विधानसभा तक का सफर
स्व. खुटे जी ने अपनी राजनीतिक यात्रा जमीनी स्तर से प्रारंभ की। प्रकाशित स्रोतों में उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1977 से बताई गई है वे ग्राम पंचायत के सरपंच चुने गए और पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा तक उनके सक्रिय सार्वजनिक जीवन का उल्लेख मिलता है।
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे जनता से दूरी बनाकर राजनीति करने के बजाय गांव-गांव और लोगों के बीच रहकर जनसमस्याओं को समझने में विश्वास रखते थे। यही कारण था कि समय के साथ उनकी अपनी व्यक्तिगत जनस्वीकृति और पहचान बनी।
सारंगढ़ क्षेत्र के कई राजनीतिक पद पर आसीन रहे
ग्राम पंचायत कौवताल के सरपंच निर्वाचित होने के बाद उनका राजनीतिक सफ़र शुरू हुआ के बाद कृषि उपज मंडी के उपाध्यक्ष बने, फिर सन् 1990 में सारंगढ़ विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए, उसके बाद जनपद पंचायत सारंगढ़ के अध्यक्ष बने, फिर सारंगढ़ कृषि उपज मण्डी समिति सारंगढ़ के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए।
सादगी और व्यवहार बना उनकी पहचान
स्व. भैयाराम खुटे जी के व्यक्तित्व को याद करते हुए उनके समकालीनों और उपलब्ध स्मृति-लेखों में उनकी सादगी, मितव्ययिता और सद्व्यवहार को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। उनके लिए सार्वजनिक जीवन केवल पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं था, बल्कि लोगों के बीच विश्वास कायम करने का दायित्व था।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि राजनीति में व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी उसका पद नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है।
नई पीढ़ी के लिए बड़ा संदेश
आज जब राजनीति और सार्वजनिक जीवन को अक्सर पद, प्रतिष्ठा और चुनावी सफलता से जोड़कर देखा जाता है, ऐसे समय में स्व. भैयाराम खुटे जी का जीवन नई पीढ़ी के सामने एक अलग आदर्श प्रस्तुत करता है।
उनकी जीवन यात्रा से युवा पीढ़ी को तीन महत्वपूर्ण संदेश मिलते हैं—
पहला—संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए।
सामान्य सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से निकलकर सार्वजनिक जीवन में अपनी पहचान बनाना बताता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, निरंतर प्रयास व्यक्ति को आगे ले जा सकता है।
दूसरा—जनता से जुड़ाव ही नेतृत्व की असली ताकत है।
पद आने-जाने वाले हैं, लेकिन जनता के साथ बनाया गया विश्वास लंबे समय तक जीवित रहता है।
तीसरा—सादगी और सेवा कभी पुरानी नहीं होती।
एक जनप्रतिनिधि की पहचान उसके व्यवहार और समाज के प्रति उसके योगदान से होती है।
स्मृतियां आज भी जीवित हैं
सारंगढ़ अंचल में स्व. भैयाराम खुटे जी को आज भी एक ऐसे जननेता के रूप में स्मरण किया जाता है, जिन्होंने जमीनी राजनीति को अपना आधार बनाया और जनसंपर्क को अपनी ताकत। प्रकाशित स्मृति-लेखों में उनके लगभग तीन दशक लंबे सार्वजनिक जीवन और निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है।
समय बीत जाता है, पद समाप्त हो जाते हैं और पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन जनता के लिए किए गए कार्य और समाज के लिए छोड़ी गई प्रेरणा कभी समाप्त नहीं होती।
स्व. श्री भैयाराम खुटे जी का जीवन भी इसी सत्य का उदाहरण है।
आज उनके स्मृतिदिवस पर यही संकल्प हो—
“उनके जीवन की सादगी को अपनाएं,
उनके संघर्ष से प्रेरणा लें,
जनसेवा को अपना धर्म बनाएं
और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा समाज बनाएं,
जिस पर हमारे पुरखों को गर्व हो।”
सारंगढ़ के इस जननेता को शत्-शत् नमन।
उनकी स्मृतियां और उनके जीवन-मूल्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहें।
॥ विनम्र श्रद्धांजलि ॥

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