मानो अजीत जोगी जी आज भी हमसे कह रहे हों—मैं भले ही इस दुनिया में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हूँ, लेकिन मेरे विचार, मेरे सपने और छत्तीसगढ़ को प्रथम बनाने की दृढ़ इच्छा आज भी इस दौड़ में दौड़ रही है। वह दुर्घटना, जिसने उनके शरीर को गहरी चोट दी, उस दिन बहुतों को लगा कि अब सब कुछ खत्म हो गया—कि जोगी जी राजनीति छोड़ देंगे, कि अब वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं रह पाएँगे। पर जिस इंसान ने संघर्ष को अपना स्वभाव बना लिया हो, उसे हालात कैसे रोक सकते हैं? व्हीलचेयर पर बैठकर भी उन्होंने जनता की आवाज़ उठाई, पीड़ा के बीच भी लोगों के सुख-दुख को अपना माना और आख़िरी साँस तक सेवा को नहीं छोड़ा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा नेतृत्व पैरों से नहीं, इरादों से चलता है। आज का युवा जब जीवन में किसी दुर्घटना, असफलता या टूटन से गुज़रे, तो उसे जोगी जी को याद करना चाहिए—कि जब सबको लगा खेल खत्म है, तब भी उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा। इसलिए निराश मत हो, रुक मत जा, क्योंकि जब तक विचार ज़िंदा हैं और उद्देश्य साफ़ है, तब तक हार नाम की कोई चीज़ नहीं होती—क्योंकि दौड़ अभी खत्म नहीं हुई है।
अमित जोगी के लेख
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