अमर शहीद वीर गुंडाधुर और 1910 के ऐतिहासिक विद्रोह को किया गया नमन
बस्तर/बालोद/छत्तीसगढ़।
आज 10 फरवरी को पूरा बस्तर अंचल और छत्तीसगढ़ प्रदेश अपने महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद वीर गुंडाधुर तथा 1910 के ऐतिहासिक भूमकाल विद्रोह के शहीदों को श्रद्धा, सम्मान और गर्व के साथ स्मरण कर रहा है। भूमकाल स्मृति दिवस के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित कर ‘जल-जंगल-जमीन’ की रक्षा हेतु दिए गए अद्वितीय बलिदान को नमन किया गया।
इस अवसर पर आदिवासी समाज के प्रमुखों, जनप्रतिनिधियों एवं सामाजिक संगठनों ने वीर गुंडाधुर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरे अंचल में ‘जय जोहार, जय भूमकाल’ के नारों के साथ वातावरण वीरता और स्वाभिमान से गूंज उठा।
इतिहास | जब ‘भूमि कांप उठी’ और हिल गई अंग्रेजी सत्ता
‘भूमकाल’ का अर्थ है — भूमि का कांपना। वर्ष 1910 में बस्तर के घने जंगलों से उठा यह जनविद्रोह वास्तव में ब्रिटिश शासन के लिए भूकंप साबित हुआ। यह आंदोलन केवल सत्ता के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और अधिकारों की रक्षा का संगठित संघर्ष था।
विद्रोह के प्रमुख कारण
ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों ने आदिवासी समाज को विद्रोह के लिए मजबूर किया। प्रमुख कारण रहे—
पारंपरिक वन अधिकारों का हनन
कठोर और अन्यायपूर्ण वन कानून
बेगार प्रथा (बिना मजदूरी जबरन श्रम)
दीवान बैजनाथ पंडा की शोषणकारी नीतियां
रणनीति | लाल मिर्च और आम की टहनी बनी क्रांति की पहचान
भूमकाल विद्रोह की सबसे अनोखी पहचान इसकी गुप्त संदेश प्रणाली थी। गांव-गांव आंदोलन का संदेश पहुंचाने के लिए लाल मिर्च और आम की टहनियों का उपयोग किया गया, जो चेतावनी, एकता और संघर्ष का प्रतीक बनीं। बिना लिखित संदेश के ही पूरा बस्तर इस आंदोलन से जुड़ गया।
प्रमुख घटनाएं | सत्ता के प्रतीकों पर सीधा प्रहार
विद्रोहियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करते हुए
सरकारी अनाज भंडार लूटकर गरीबों में वितरित किए
पुलिस थानों, स्कूलों और प्रशासनिक प्रतिष्ठानों पर हमला किया
अंग्रेजी प्रशासन को गांवों से खदेड़ने का साहसिक प्रयास किया
नायक गुंडाधुर | बस्तर का अजेय योद्धा
नेथानार गांव के साधारण जनजातीय युवक वीर गुंडाधुर इस विद्रोह के महान नायक बने। उनकी नेतृत्व क्षमता, साहस और रणनीति ने उन्हें जन-जन का नायक बना दिया। उन्हें सम्मानपूर्वक ‘छत्तीसगढ़ का तात्या टोपे’ भी कहा जाता है।
अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए इनाम घोषित किए, लेकिन वे कभी ब्रिटिश हुकूमत के हाथ नहीं आए। यही कारण है कि वे आज भी बस्तर की लोकगाथाओं में अमर हैं।
दबा विद्रोह, पर झुकी सत्ता
हालांकि अंग्रेजों ने सैन्य बल से विद्रोह को दबा दिया, लेकिन दबाव में आकर
प्रस्तावित आरक्षित वन क्षेत्र को लगभग आधा करना पड़ा ,कई दमनकारी नियमों में ढील देनी पड़ी भूमकाल विद्रोह ने आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत नींव रखी।
वर्तमान में सम्मान | जीवित विरासत
आज भूमकाल दिवस के अवसर पर बस्तर संभाग और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में रैलियां, जनसभाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते है।
वीर गुंडाधुर के नाम पर राज्य स्तरीय खेल पुरस्कार स्थापित है ,रायपुर स्थित आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय में उनकी गाथा संरक्षित है
सर्व आदिवासी समाज जिला बालोद अध्यक्ष साथ ही KBKS स्थापना से लेकर प्रशिक्षणार्थी रहे तुका राम कोर्राम ने कहा कि
“भूमकाल केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारे स्वाभिमान, संघर्ष और अधिकारों की अमर ज्वलंत ज्योति है। जिस समय हमारे लिए कोई कानून नहीं थे, तब भी हमारे अपठित पुरखों ने हमें यह सिखाया कि यह देश और जल-जंगल-जमीन हमारा है और इस पर पहला हक हमारा है।”
उन्होंने कहा कि आज हमें संविधान के माध्यम से पांचवीं अनुसूची, पेसा अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम, भूमि अधिग्रहण अधिनियम और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे मजबूत कानूनी अधिकार प्राप्त हैं, जो हमारी सुरक्षा का कवच हैं।
“अब केवल स्मृति दिवस मनाना या उद्बोधन देना पर्याप्त नहीं है। हमें पुरखों के पदचिन्हों पर चलते हुए जनजागरूकता, सहभागिता और एकता के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सम्मानजनक समाज विरासत में दे सकें।”
भूमकाल विद्रोह आदिवासी स्वाभिमान, एकता और संघर्ष की अमर मिसाल है। वीर गुंडाधुर और उनके साथियों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों को अपने अधिकारों और संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव प्रेरित करता रहेगा।
10 फरवरी — भूमकाल स्मृति दिवस
वीर क्रांतिकारियों का 116वां स्मरण दिवस साथ ही आज ही के दिन KBKS के विचार की उत्पत्ति हुई |

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