February 15, 2026

कर्रेझर में रात्रिकालीन अधिवेशन एवं महाशिवरात्रि पर्व श्रद्धा-उत्साह के साथ संपन्न

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बालोद-गुरूर ब्लॉक के कर्रेझर गांव में आदिवासी गोंडवाना सेवा परिक्षेत्र कर्रेझर समिति द्वारा रात्रिकालीन एक दिवसीय अधिवेशन एवं महाशिवरात्रि पर्व का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत गोड़ समाज द्वारा पारंपरिक विधि से घरों से कलश निकालकर की गई। कलश यात्रा ने पूरे गांव की गलियों का भ्रमण किया, जिससे वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण हो उठा।

कलश यात्रा के उपरांत निर्धारित स्थल पर मंचीय कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां अतिथियों एवं सामाजिक पदाधिकारियों ने गोंड़ी पद्धति से पूजा-अर्चना कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। सतरंगी ध्वजारोहण की गरिमामयी रस्म मुख्य अतिथि विकास मरकाम जी के कर-कमलों से संपन्न हुई।

ध्वजारोहण के पश्चात सभी अतिथियों का गोंड़ी परंपरा के अनुसार पीले चावल, पीले गमछे एवं पगड़ी बांधकर आत्मीय सम्मान किया गया।
शुरुआती उद्बोधन में परिक्षेत्र अध्यक्ष मेघनाथ सलाम ने सभी अतिथियों एवं समाजजनों का आभार व्यक्त करते हुए युवाओं से सामाजिक रीति-रिवाज को सीखने और ऐसे आयोजनों में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे विकास मरकाम जी छ.ग. आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधीय पादप बोर्ड अध्यक्ष ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज मैं इस पावन धरती के गौरवशाली इतिहास का स्मरण करना चाहता हूँ। यह क्षेत्र कभी मध्य भारत के शक्तिशाली गढ़ों में से एक था, जहाँ गोंड साम्राज्य की समृद्ध परंपरा और वैभव विद्यमान था। बावन गढ़ और संतावन परगना जैसे क्षेत्र गोंड शासन की शौर्यगाथा के साक्षी रहे हैं।

आज़ादी से पूर्व छत्तीसगढ़, सीपी एंड बरार प्रदेश का हिस्सा था, जिसकी राजधानी नागपुर थी। नागपुर को बसाने का श्रेय देवगढ़ के महान गोंड राजा बख्त बुलंद शाह को जाता है।

बाद में छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश में शामिल हुआ, जिसकी राजधानी भोपाल रही। भोपाल के निर्माण और विकास में महारानी कमलापति का अमूल्य योगदान रहा, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में नेतृत्व संभाला और भोपाल ताल का निर्माण कराया। आज उनके सम्मान में रानी कमलापति रेलवे स्टेशन स्थापित है।

एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य बना, जिसकी राजधानी रायपुर है। रायपुर की स्थापना के पीछे भी गोंड शासकों की ऐतिहासिक भूमिका मानी जाती है। कहा जाता है कि रतनपुर के राजा जब अपने पुत्र के विवाह के लिए रतनपुर से हजारों घोड़ें, हाथियों सैनिकों साथ में महिला पुरुष के साथ चंद्रपुर के लिए निकले तो बीच में रायपुर में विवाह यात्रा के दौरान यहाँ रुके, और जन-सेवा हेतु बुढ़ा तालाब का निर्माण कराया गया, जहाँ बुढ़ा देव की स्थापना आज भी हमारी आस्था का केंद्र है।

हमारी यह विरासत केवल राजाओं और किलों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी आराध्य शक्तियों में भी प्रतिबिंबित होती है —
डोंगरगढ़ की बमलाई दई,
रतनपुर की महमाई दई,
सम्बलपुर की संबलाई दई,
दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी माई,
चंद्रपुर की चंद्रहासिनी,
और रायगढ़ की बुढ़ी माई — ये सभी हमारी संस्कृति, श्रद्धा और पहचान के जीवंत प्रतीक हैं।

अंग्रेजी शासन के दौरान धीरे-धीरे हमारी परंपराएँ, पद्धतियाँ और सांस्कृतिक चेतना कमजोर होती गईं। आज यदि हमें अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त करना है, तो हमें अपनी संस्कृति को समझना, अपनाना और आगे बढ़ाना होगा।

वर्तमान समय में समाज के उत्थान के दो सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं —
पहला, शिक्षा
दूसरा, नशे से दूरी

हमें बड़े सपने देखने होंगे, क्योंकि जब लक्ष्य ऊँचा होता है, तभी उपलब्धियाँ भी बड़ी होती हैं। साथ ही, नशे जैसी बुराइयों से समाज को दूर रखना होगा। कोया फूल, जो हमारी पूजा और आस्था का प्रतीक है, उसका उपयोग केवल धार्मिक पद्धतियों में हो — न कि नशे के रूप में।

वार्षिक अधिवेशन जैसे मंचों पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि यदि समाज में कोई गरीब या जरूरतमंद परिवार है, तो उसके बच्चों की शिक्षा में सहयोग करेंगे। किसी एक बच्चे को आगे बढ़ाना, पूरे समाज को आगे बढ़ाने के समान है।

आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें —
शिक्षा को अपनाएँगे,
संस्कृति को समझेंगे,
और नशे से दूर रहेंगे।

यही हमारे समाज के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।

कृष्णा ठाकुर महासचिव छ.ग. गोडवाना गोंड महासभा बालोद ने कहा कि वार्षिक अधिवेशन किसी भी समाज के लिए केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि यह सामूहिक आत्ममंथन और विकास का महत्वपूर्ण अवसर होता है। समाज के लोग तन, मन और धन से इसमें सहभागी बनते हैं, क्योंकि पूरे वर्ष में हुए सामाजिक क्रियाकलापों, आय-व्यय का लेखा-जोखा, तथा सामाजिक व्यवस्थाओं पर इसी मंच से चर्चा होती है।

यह अधिवेशन आपसी संवाद, विचारों के आदान-प्रदान और नई सीख का अवसर प्रदान करता है। विशेष रूप से महिलाओं की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। महिलाओं को संस्कारों की जननी माना जाता है, इसलिए बच्चों को सामाजिक मूल्यों और व्यवस्था का ज्ञान देना उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

महान विचारक डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था —
“शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पिएगा वह दहाड़ेगा।”
यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि शिक्षा ही समाज को जागरूक, सक्षम और आत्मनिर्भर बनाती है।

हमारा समाज सरल और सहज स्वभाव के लिए जाना जाता है, किंतु आज के समय में एक गंभीर समस्या उभर रही है — आय से अधिक व्यय। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति को कमजोर करती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अनावश्यक खर्चों और नशे जैसी बुरी आदतों से दूर रहें, मन को स्वच्छ रखें और एक स्वस्थ, जागरूक समाज का निर्माण करें।

जीवन में हमें पाँच महत्वपूर्ण बातों को याद रखना और अपनाना चाहिए:

  1. पढ़ाई (शिक्षा)
    हमें शिक्षा में सदैव आगे रहना है। स्वयं शिक्षित बनना और समाज को शिक्षित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
  2. लड़ाई (अधिकारों के लिए संघर्ष)
    अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए जागरूक और शिक्षित होना आवश्यक है। ज्ञान के साथ किया गया संघर्ष ही सफल होता है।
  3. कमाई (आर्थिक सशक्तिकरण)
    आज केवल नौकरी ही नहीं, बल्कि व्यवसाय और स्वरोजगार की ओर भी ध्यान देना चाहिए। नए कौशल सीखकर स्वयं तथा समाज को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना समय की मांग है।
  4. भलाई (सामाजिक सहयोग)
    जब हम आर्थिक रूप से सक्षम होंगे, तभी अपने परिवार और समाज के अन्य लोगों की सहायता कर सकेंगे, जिससे सामूहिक प्रगति संभव होगी।
  5. सफाई (विचारों और वातावरण की शुद्धता)
    एक बेहतर समाज का निर्माण अच्छे विचारों, स्वच्छ आचरण और सकारात्मक व्यक्तित्व से होता है। जब श्रेष्ठ सोच वाले लोग समाज से जुड़ते हैं, तभी समाज सशक्त बनता है। गोंडवाना गोंड महासभा के जिला अध्यक्ष प्रेमलाल कुंजाम ने समाज की वर्तमान परिस्थितियों, पारंपरिक व्यवस्थाओं और युवाओं की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि उदारीकरण की नीतियों के बाद रोजगार के स्वरूप में बड़ा बदलाव आया है, इसलिए आज के समय में समाज को व्यवसाय और स्वावलंबन पर विशेष ध्यान देना होगा। खाली पड़ी जमीनों का उपयोग कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया।

कुंजाम ने युवाओं और बच्चों को प्रतियोगिताओं में शामिल करने की जरूरत बताते हुए पारंपरिक गोटूल व्यवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने गोटूल की व्याख्या करते हुए कहा कि “गो” का अर्थ शिक्षा और “टूल” का अर्थ समूह में रहकर सीखना है, जहां जीवन से जुड़ी विविध शिक्षाएं दी जाती थीं। उनके अनुसार, क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप समाज की बातों को व्यवस्थित रूप से रखने और समस्याओं का समाधान खोजने की दिशा में काम होना चाहिए।

उन्होंने समाज में महिला, पुरुष और युवा — इन तीनों विंग को नियामक और संगठित तरीके से सक्रिय करने की बात कही, ताकि सामाजिक व्यवस्था को सही ढंग से समझा और आगे हस्तांतरित किया जा सके। साथ ही देव व्यवस्था और गोत्र व्यवस्था के नियमों को युवाओं द्वारा सीखने और अपनाने पर भी बल दिया।

वक्तव्य के दौरान कुंजाम ने चिंता जताई कि शिक्षित होने के साथ कुछ युवा समाज की पारंपरिक व्यवस्थाओं से दूर होते जा रहे हैं, जिससे विवाह और पारिवारिक संरचना पर प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने सामाजिक नियमों के अंतर्गत जन्म, मृत्यु और विवाह जैसी व्यवस्थाओं को समाज के स्तर पर संचालित करने की आवश्यकता बताई। कस्टमरी लॉ के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक वैवाहिक व्यवस्थाएं अलग प्रकृति की हैं, जिनका पालन आवश्यक है।

उन्होंने सरकारी योजनाओं की जानकारी जनप्रतिनिधियों द्वारा समाज तक पहुंचाने की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए विशेष रूप से धरती आबा योजना जैसे अभियानों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की बात कही। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि समाज में मछली, मुर्गी और अंडे का उपयोग व्यापक है, लेकिन इनसे जुड़े व्यवसायों में भागीदारी कम है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है।

अंत में कुंजाम ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के महत्व को रेखांकित करते हुए महाशिवरात्रि के पर्व के प्रति समाज को जागरूक करने की भी बात कही।
अंततः, हमें मिलकर एक ऐसे समाज की परिकल्पना करनी है जो शिक्षित, संगठित, आर्थिक रूप से सुदृढ़ और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण हो।

विशेष अतिथियों में शामिल रहे राकेश यादव( जन सेवक संजारी बालोद), सोमेश कुमार सोरी( पूर्व अध्यक्ष नगर पंचायत डौंडी), उत्तरा मरकाम(अध्यक्ष आदिवासी गोडवाना सेवा समिति तहसील गुरुर), नागेश्वर सलाम(अध्यक्ष युवा प्रभाग छ.ग. गोडवाना गोंड महासभा जिला बालोद), कन्हैया लाल साहू(सरपंच ग्राम पंचायत कर्रेझर) तथा शैलेन्द्र सोरी(सचिव आदिवासी गोडवाना सेवा समिति तहसील गुरुर),
संरक्षक नरोत्तम धुव, बलराम गोटी, एवं भुनेश्वर नागवंशी, उपाध्यक्ष मानसिंह पोया, हिरामन कुंजाम, सचिव नवल सिंह धुव, सह सचिव रामरतन सेवता, कोषाध्यक्ष धनी राम ध्रुव एवं ऑडिटर दीपक सलाम, परमेश्वर सिंद्राम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई साथ ही समाज के महिला पुरुष बच्चे और ग्रामीण शामिल रहे |

अधिवेशन के दौरान बीच-बीच बच्चों द्वारा अपने संस्कृति पर नृत्य कर समाज को संदेश साथ ही समाज की प्रगति, शिक्षा, परंपरा, संस्कृति तथा संगठनात्मक सुदृढ़ता जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने सामाजिक एकता, युवा सहभागिता और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर विशेष बल दिया।
वार्षिक अधिवेशन एवं महाशिवरात्रि पर्व का आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ।