◆◆भाई ने भाइयों को पढ़ाया, अब भाइयों ने भाई को बनाया एम.बी.बी.एस. डॉक्टर◆◆
सारंगढ़ ●● कहते हैं – पढ़ाई की कोई उम्र नहीं है, पढ़ाई में कोई शर्म नहीं है। इस तथ्य को साकार कर रहे हैं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सारंगढ में पदस्थ चिरायु के आयुष चिकित्सा अधिकारी सह जिला नोडल अधिकारी (चिरायु) डॉ0 प्रभु दयाल खरे। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) में 2014 से लगातार 11 वर्ष 2 माह से स्कूली व आंगनबाड़ी के बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए सेवा दे रहे डॉ. प्रभु दयाल खरे जिनकी उम्र 44 वर्ष की है, चिकित्सा शिक्षा में होने वाले देश के सबसे बड़े परीक्षा नीट 2025 क्वालीफाई करने के उपरांत एम.बी.बी.एस. अध्ययन हेतु रिम्स मेडिकल कॉलेज रायपुर (छत्तीसगढ़) एलॉटमेंट हुवा है जहाँ डॉ0 खरे अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे।
डॉ0 खरे स्वयं 2002 बैच के बी.एच.एम.एस. (होम्योपैथी चिकित्सक) हैं साथ ही बैचलर ऑफ साइंस, फार्मेसी व पोस्ट ग्रेजुएट हॉस्पिटल मैनेजमेंट की डिग्री भी हासिल की है। इनके पिता श्री दुजे राम खरे सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। ये अपने भाई डॉ0 के0डी0खरे (लैपेरोस्कोपिक & रोबोटिक सर्जन, यूरोलॉजिस्ट), डॉ0 जी0डी0 खरे (एनेस्थेसियोलॉजिस्ट), श्रीमती लीमा खरे (क्लेरिकल कैडर- यूको बैंक) को इस ऊँचे मुकाम तक पहुँचाया है। अब इनके भाइयों ने भी इन्हें और ऊंचे ओहदे दिलाने हेतु 44 वर्ष के उम्र में भी इन्हें पढ़ने को प्रेरित करने के साथ साथ मार्गदर्शन करते रहे, तब जाकर डॉ0 खरे जी को ये सफलता मिल पाई है।

इससे यह सिद्ध होता है कि मेहनत और लगन से कोई भी सपना साकार किया जा सकता है। हमेशा अपने लक्ष्य को पहली महत्त्वाकांक्षा बनाकर आगे बढ़ते रहने से सफलता अवश्य कदम चूमेगी।
राज्य में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ की अच्छी छवि बनाये रखने में इनका अहम योगदान रहा है। बच्चों के स्वास्थ्य शिक्षा को ध्यान में रखते हुए ही ये मॉडर्न मेडिसिन के अध्ययन हेतु प्रवेश लिए हैं और एमबीबीएस के अध्ययन पश्चात पोस्ट ग्रेजुएट करने के भी इच्छुक हैं ताकि सारंगढ़ क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान किया जा सके।
अपने इस सफलता का श्रेय अपनी पत्नी श्रीमती संगीता खरे, प्रेरणास्रोत पिता श्री दूजेराम खरे, सहयोगी, मार्गदर्शक व एक गुरुजी के समान भाई डॉ0 के0डी0खरे, डॉ0 लीना खरे, डॉ0 जी0डी0 खरे, डॉ0 सुधा खरे तथा परिवार के नन्हें मुन्हे बच्चों को देते हैं जो इनके जॉब के साथ इस कठिन परीक्षा की तैयारी को प्यार व दुलार के साथ आसान बनाने में कामयाब रहे।
●● कहते हैं – पढ़ाई की कोई उम्र कोई उम्र नहीं है, पढ़ाई में कोई शर्म नहीं है। इस तथ्य को साकार कर रहे हैं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सारंगढ में पदस्थ चिरायु के आयुष चिकित्सा अधिकारी सह जिला नोडल अधिकारी (चिरायु) डॉ0 प्रभु दयाल खरे। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) में 2014 से लगातार 11 वर्ष 2 माह से स्कूली व आंगनबाड़ी के बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए सेवा दे रहे डॉ. प्रभु दयाल खरे जिनकी उम्र 44 वर्ष की है, चिकित्सा शिक्षा में होने वाले देश के सबसे बड़े परीक्षा नीट 2025 क्वालीफाई करने के उपरांत एम.बी.बी.एस. अध्ययन हेतु रिम्स मेडिकल कॉलेज रायपुर (छत्तीसगढ़) एलॉटमेंट हुवा है जहाँ डॉ0 खरे अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे।
डॉ0 खरे स्वयं 2002 बैच के बी.एच.एम.एस. (होम्योपैथी चिकित्सक) हैं साथ ही बैचलर ऑफ साइंस, फार्मेसी व पोस्ट ग्रेजुएट हॉस्पिटल मैनेजमेंट की डिग्री भी हासिल की है। इनके पिता श्री दुजे राम खरे सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। ये अपने भाई डॉ0 के0डी0खरे (लैपेरोस्कोपिक & रोबोटिक सर्जन, यूरोलॉजिस्ट), डॉ0 जी0डी0 खरे (एनेस्थेसियोलॉजिस्ट), श्रीमती लीमा खरे (क्लेरिकल कैडर- यूको बैंक) को इस ऊँचे मुकाम तक पहुँचाया है। अब इनके भाइयों ने भी इन्हें और ऊंचे ओहदे दिलाने हेतु 44 वर्ष के उम्र में भी इन्हें पढ़ने को प्रेरित करने के साथ साथ मार्गदर्शन करते रहे, तब जाकर डॉ0 खरे जी को ये सफलता मिल पाई है।
इससे यह सिद्ध होता है कि मेहनत और लगन से कोई भी सपना साकार किया जा सकता है। हमेशा अपने लक्ष्य को पहली महत्त्वाकांक्षा बनाकर आगे बढ़ते रहने से सफलता अवश्य कदम चूमेगी।
राज्य में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ की अच्छी छवि बनाये रखने में इनका अहम योगदान रहा है। बच्चों के स्वास्थ्य शिक्षा को ध्यान में रखते हुए ही ये मॉडर्न मेडिसिन के अध्ययन हेतु प्रवेश लिए हैं और एमबीबीएस के अध्ययन पश्चात पोस्ट ग्रेजुएट करने के भी इच्छुक हैं ताकि सारंगढ़ क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान किया जा सके।
अपने इस सफलता का श्रेय अपनी पत्नी श्रीमती संगीता खरे, प्रेरणास्रोत पिता श्री दूजेराम खरे, सहयोगी, मार्गदर्शक व एक गुरुजी के समान भाई डॉ0 के0डी0खरे, डॉ0 लीना खरे, डॉ0 जी0डी0 खरे, डॉ0 सुधा खरे तथा परिवार के नन्हें मुन्हे बच्चों को देते हैं जो इनके जॉब के साथ इस कठिन परीक्षा की तैयारी को प्यार व दुलार के साथ आसान बनाने में कामयाब रहे।


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