समस्त मांगलिक कार्यों के प्रारंभ में भगवान श्री गणेश की अभ्यर्थना की जाती है।सभी गणों के स्वामी होने के कारण इनका नाम गणेश है। भगवान गणेश का व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक माना गया है।उनका मस्तक हाथी का है,और वाहन मूषक है।उनकी दो पत्नियां ऋद्धि और सिद्धि हैं। ऋग्वेद में सभी कार्य का प्रारंभ गणेश जी की वंदना से होता है।वे वैदिक देवता हैं, भगवान गणेश के उच्चारण से वेदपाठ प्रारंभ होता है।गणेश आदिदेव हैं।गणेश पुराण में ब्रम्हा, विष्णु एवं शिव के द्वारा उनकी पूजा किए जाने तक का उल्लेख मिलता है।
गणपति से ही सारा जगत उत्पन्न होता है।जगत उन्हीं में स्थित है,और फिर उन्हीं में ही लीन हो जाता है। आध्यात्मिक जगत में भी गजानन प्रथम पूज्य हैं।गणेश जी अनादि हैं। योगशास्त्र में कुंडलिनी जागरण का आरंभ मूलाधार चक्र से होता है,और इसके अधिपति गणपति ही माने जाते हैं।गणपति की जन्म तिथि चतुर्थी सभी तिथियों की माता है।सभी तिथियां चतुर्थी से ही प्रकट हुई है।इसी चतुर्थी है ही प्राकट्य जुड़ा है।गणपति स्थूल और सूक्ष्म दोनों में व्याप्त चेतना के अधिपति हैं।गणेश जी की आरती में एक पंक्ति आती है,चौदह लोक में फिरे गणपति ।ये चौदह लोक पंच कर्म इन्द्रियां,पंच ज्ञानेंद्र इंद्रियां तथा मन,बुद्धि, चित्त,और अहंकार की अंत:करण की चतुषटयी है। इन्हीं चौदह लोकों के अधिपति भी श्री गणेश हैं,जो स्थूल सूक्ष्म रूप से परे होकर भी सबमें व्याप्त हैं।
प्रथम पूज्य गणपति को वैसे चतुर्थी प्रिय है।भाद्र मास शुक्ल चतुर्थी का विशेष महत्व माना जाता है।यह तिथि श्री गणेश के आविर्भाव की तिथि है। संपूर्ण देश में गणेश चतुर्थी का पर्व धूमधाम से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।वरदमूरति गणपति भक्त के प्रति अत्यंत उदार रहते हैं।जो भक्तों की गुहार सुनते हैं। मोदक प्रिय गणेश जी को अपने – अपने घर लाना भक्तों को आल्हादित कर देता है।मोदक सदैव आनंदित रहने और ब्रम्हा में लीन हो जाने का संदेश देता है।गणपति के इसी भाव से संपूर्ण जगत को परिचय करने के लिए गणेशोत्सव मनाया जाता है।यह केवल उत्सव नहीं है, बल्कि आत्मसाक्षात्कार की प्रथम पीठिका भी है। गणपति इसलिए भी प्रथम पूज्य हैं क्योंकि ये साधक को आरंभ से लेकर लक्ष्य तक स्वयं लेकर चलते हैं,साधक उन्हें जागता है, उनमें स्थित होता है।
प्रथम पूज्य गणेश की शारीरिक बनावट के मुकाबले उनका वाहन चूहा अत्यंत छोटा है।चूहे का काम किसी चीज को कुतरना है।वह चीर फाड़कर उसके प्रत्येक अंग-प्रत्यंग का विश्लेषण करता है।गणेश बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता हैं। तर्क-वितर्क में वे सिद्धहस्त हैं। मूषक के इन्हीं गुणों को लेकर उन्होंने इसे अपना वाहन चुना है।गजानन का सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है।जो उनके सचेत होने का संकेत है।इसके संचालन से दुख दैन्य समाप्त हो जाते हैं। अनिष्टकारी शक्तियां कोसों दूर भाग जाती है।सूंड बडे- बड़े दिग्गजों को भयभीत करती हैं।इस सूंड से गणेश ब्रमहा जी पर पानी व फूल बरसाते हैं।सुख- समृद्धि हेतु उनकी दाईं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए, वहीं शत्रु को परास्त करने या ऐश्वर्य पाने के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए।
गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है।जिसे लंबोदर भी कहते हैं। लंबोदर होने के कारण सारी बात चाहे वो अच्छी हो या बुरी पचा लेते हैं।किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं।संगीत, नृत्य कलाओं के मर्मज्ञ हैं।उनका पेट विविध विद्याओं का कोश है।
गणेश जी लंबे कान वाले हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण भी कहा जाता है।लंबे कान वाले भाग्यशाली होते हैं।ये सबकी सुनते हैं और अपनी बुद्धि और विवेक से ही कार्य का क्रियान्वयन करते हैं। बहे कान वाले सदैव सजग, सतर्क और सावधान रहने का भी संकेत देते हैं।
गणेश जी हमारी बुद्धि को परिष्कृत एवं परिमार्जित भी करते हैं। विघ्नों का समूल नाश करते हैं।गणेश जी का व्रत रखने से जीवन के सारे विघ्न दूर होते हैं।सदा मंगल होता है।जीवन के सभी प्रकार के विघ्नों का नाश एवं शुचिता व शुभता की प्राप्ति के लिए हमें गणेश जी की अभ्यर्थना करनी चाहिए।
डॉ.मनीषा त्रिपाठी
राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित
प्रधानपाठक
शासकीय रविशंकर प्राथमिक शाला
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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