बालोद। होलिका दहन को जहां बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, वहीं बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड के ग्राम जाटा दाह में यह पर्व एक अनोखी परंपरा के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां होलिका दहन के बाद अंगारों पर चलने की परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है, जिसे ग्रामीण आस्था, साहस और सामूहिक विश्वास का प्रतीक मानते हैं।
ग्रामीण जगत पाल सिन्हा के अनुसार यह परंपरा कब शुरू हुई, इसकी स्पष्ट जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन बुजुर्गों के समय से यह आयोजन लगातार होता आ रहा है। होली के अवसर पर आयोजित यह परंपरा पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय रहती है और ग्रामीण इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं।
ग्रामीणों का दावा है कि अब तक इस आयोजन के दौरान किसी को गंभीर शारीरिक नुकसान नहीं हुआ है। लोगों का मानना है कि यह ईश्वर की कृपा और श्रद्धा की शक्ति का परिणाम है। वहीं कुछ लोग इसे मानसिक दृढ़ता और सामूहिक विश्वास का प्रभाव भी बताते हैं।
इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को किया जाएगा, जबकि ग्रहण के कारण रंगों की होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। ऐसे में गांव में 2 मार्च की रात से ही विशेष उत्साह का माहौल रहेगा और सुबह अंगारों पर चलने की परंपरा निभाई जाएगी।

परंपरा के अनुसार रात से ही ग्रामीण नगाड़ों और जयकारों के साथ एकत्रित होते हैं। सुबह लगभग 4 बजे होलिका दहन के बाद जब लकड़ियां अंगारों में बदल जाती हैं, तब सुबह 6 से 7 बजे के बीच श्रद्धालु अंगारों पर चलकर अनुष्ठान पूरा करते हैं।
ग्रामीणों की मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से अंगारों पर चलने से जीवन के दुख-कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं। हालांकि इस परंपरा में कुछ नियम भी निर्धारित हैं, जिनके तहत केवल युवा और वयस्क पुरुष ही इसमें भाग लेते हैं, जबकि महिलाओं और छोटे बच्चों के अंगारों पर चलने पर प्रतिबंध रहता है।
जाटा दाह की यह अनोखी परंपरा आसपास के गांवों में भी प्रसिद्ध है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर इस आयोजन के साक्षी बनते हैं। ग्रामीणों के लिए यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और सांस्कृतिक पहचान का उत्सव है।

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