हमारी साल भर की ऊपरी कमाई यह ग्रीष्मकालीन अवकाश ही है,इससे हमें वंचित नहीं किया जाए – गुरूजी अनुरोध।
छत्तीसगढ़ / सारंगढ़/बरमकेला क्या शिक्षकों की गर्मी छुट्टी सिर्फ नाम की ?
जिस प्रकार से छत्तीसगढ़ के कई जिलों में शासन द्वारा प्रदत्त अवकाश के विरुद्ध में समर कैंप का आदेश निकाला जा रहा है यह बिल्कुल शिक्षकों के कार्यक्षमता के लिए हताशा जनक है,वैसे राज्य शासन ने ग्रीष्मकालीन अवकाश के संबंध ने पूर्व में ही प्रदेश भर के जिला शिक्षा अधिकारियों के नाम एक आदेश क्रमांक एफ 3–2 /2016/20–तीन दिनांक 20.9.24 को ही दिनांक 1 मई 2025 से 15 जून 2025 तक 46 दिन के ग्रीष्मकालीन अवकाश के आदेश जारी किए गए हैं- इसकी एवज में हम शिक्षक को अन्य कर्मचारियों के औसत में कम अर्जित अवकाश प्राप्त होती है। इसके बावजूद भी जैसे ही गर्मियों की तपती धूप सिर चढ़कर बोलने लगती है, वैसे ही स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएं संपन्न हो जाती हैं और बच्चे अपने ननिहाल, दादी-नानी के घर छुट्टियाँ मनाने निकल पड़ते हैं। पर सवाल उठता है कि क्या शिक्षकों के लिए भी यही राहत आती है? अफसोस की बात है कि “गर्मी की छुट्टियाँ” केवल एक भ्रम बनकर रह गई हैं – खासकर तब जब विभाग समर कैंप के नाम पर शिक्षकों की छुट्टियों पर ग्रहण लगा देता है।
समर कैंप – उद्देश्य या औपचारिकता?
गर्मी के मौसम में जब तापमान 45 डिग्री को पार करता है, तब बच्चों को स्कूल बुलाना स्वयं उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। अधिकतर बच्चे तो परीक्षाओं के बाद घर से दूर छुट्टियाँ बिताने निकल जाते हैं। फिर ऐसे में समर कैंप की सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। क्या ये कैंप केवल रिपोर्ट और फोटोज़ तक सीमित होकर एक औपचारिकता मात्र नहीं बन चुके हैं?

शिक्षकों पर दोहरी मार नहीं है क्या?
शिक्षकों को लेकर समाज में यह धारणा बनी हुई है कि उन्हें सालभर में सबसे ज्यादा छुट्टियाँ मिलती हैं। लेकिन यह सच्चाई का केवल एक पक्ष है। दूसरी सच्चाई यह है कि उन्हें निरंतर गैर-शैक्षणिक गतिविधियों, चुनाव ड्यूटी, सर्वेक्षण, योजनाओं के कार्यान्वयन और अब समर कैंप जैसी गतिविधियों में भी उलझा दिया जाता है।
अक्सर यह देखा गया है कि *शिक्षकों के निर्धारित अवकाश को जिला स्तर से जारी आदेशों द्वारा रद्द कर दिया जाता है, जो शासन द्वारा तय नियमों की भी अनदेखी है। यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन के विरुद्ध है बल्कि एक पेशे के सम्मान के साथ अन्याय भी।
क्या शिक्षक रोबोट हैं?
शिक्षक भी आम इंसान हैं, जो पूरे साल बच्चों की शैक्षणिक, नैतिक और सामाजिक शिक्षा में संलग्न रहते हैं। परीक्षाएं लेने से लेकर परिणाम तैयार करने तक, स्कूलों के क्रियाकलापों को सुचारू रूप से संचालित करने तक – शिक्षक हर मोर्चे पर तैनात रहते हैं। जब उन्हें विश्राम का समय मिलता है, तब “शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के नाम पर” नए-नए प्रयोग उन पर थोप दिए जाते हैं।
समाज की सोच बदलनी होगी
समाज को यह समझने की ज़रूरत है कि शिक्षक कोई विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग नहीं हैं। उन्हें भी मानसिक और शारीरिक विश्राम की ज़रूरत होती है ताकि वे अगले सत्र में बच्चों को और बेहतर ढंग से शिक्षा दे सकें। लगातार कार्यभार और आदेशों के बोझ में एक शिक्षक की रचनात्मकता, ऊर्जा और समर्पण धीरे-धीरे कम हो जाता है, जो अंततः छात्रों के हित में भी नहीं होता।
शिक्षकों के साथ न्याय तभी संभव है जब नीतियों को जमीनी सच्चाई के आधार पर तय किया जाए। समर कैंप जैसी योजनाओं को लागू करने से पहले ज़मीनी स्थिति, बच्चों की उपस्थिति, मौसम की तीव्रता और शिक्षकों के अधिकारों का संज्ञान लिया जाना चाहिए।
शिक्षकों को केवल आदेशों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली का सजीव स्तंभ समझा जाए।
आइए, संवेदनशील बनें, सोचें – क्या हम अपने बच्चों को गर्मी की छुट्टियों में स्कूल भेजते हैं?
अगर नहीं, तो फिर शिक्षकों से ये उम्मीद क्यों?

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