मैं शिक्षक हूं। विद्यालय है मेरा कर्मक्षेत्र। वही मेरा गिरजाघर, गुरूद्वारा और शिवालय। जहां नेकी कर्म पथ पे रहती हूं अग्रसर। गढ़ती हूं विद्यार्थियों का भविष्य, देती हूं संस्कार, शिष्टाचार ज्ञान का भंडार। सतत् सक्रिय रहती हूं अपने कर्म पर, परोपकार का भाव रखती हूं सहेजकर। हर विद्यार्थी बनता प्रवीण,पाता पहचान। मिलता मान-सम्मान, मैं करती हूं अभिमान। पढ़ाई में रहते बच्चे अव्वल,है बच्चे हूनरमंद। पढ़ाई, खेलकूद,हर में है पारंगत। हर प्रतियोगिता में देते हैं शिकस्त। मां शारदे कंठ में विराजे करती हूं कामना। सद्बुद्धि,सदाचरण से कमतर न तराशना। प्रखर बुद्धि,बहुमुखी प्रतिभा के धनी सारे बच्चे। निश्छल भाव से परिपूरित हैं मन के सच्चे। नन्हें बच्चों की किलकारी जब गूंजती पहाड़े, फर्राटेदार भाषण से। होता मन पुलकित,समझती हूं गौरवान्वित। डॉ. मनीषा त्रिपाठी राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित प्रधानपाठक शासकीय रविशंकर प्राथमिक शाला रायगढ़ ( छत्तीसगढ़)
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