चारामा –
चारामा विकासखंड के ग्राम कहाडगोंदी की धरती इन दिनों केवल एक गांव नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता की जीवित चेतना बन गई। 20 से 24 दिसंबर तक आयोजित कोया पुनेम एवं संवैधानिक केंद्रीय प्रशिक्षण शिविर में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे 920 से अधिक आदिवासी भाई-बहनों ने एक स्वर में अपनी पहचान, परंपरा और अधिकारों की रक्षा का संकल्प दोहराया।
पंडाल के नीचे ज़मीन पर बैठे प्रशिक्षणार्थी, सिर पर पारंपरिक पगड़ी, गले में पहचान पत्र और आंखों में संघर्ष की स्मृतियां—यह दृश्य बता रहा था कि यह शिविर किसी औपचारिक प्रशिक्षण से कहीं आगे, आदिवासी समाज के आत्मसम्मान की वापसी का मंच है।

कोया पुनेम: जीवन दर्शन, न कि केवल परंपरा
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि कोया पुनेम कोई रस्म नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन पद्धति, प्रकृति पूजा और सामूहिक चेतना का मूल आधार है। ग्राम स्वशासन, सामूहिक निर्णय और सामाजिक अनुशासन ही सदियों से आदिवासी समाज को जोड़कर रखने वाली ताकत रही है।
वन अधिकार: क़ानून नहीं, पूर्वजों की विरासत
वन अधिकार मान्यता अधिनियम 2006 पर दिए गए सत्रों में बताया गया कि जल-जंगल-जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन का अस्तित्व है। वक्ताओं ने कहा कि ग्राम सभा सर्वोच्च है और सामुदायिक वन अधिकार भीख नहीं, पीढ़ियों से मिला हक़ है, जिसे जानना और पाना आज की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।
स्वास्थ्य जागरूकता: मज़बूत शरीर, मज़बूत समाज
शिविर के दौरान आयोजित स्वास्थ्य जांच में 1130 से अधिक ग्रामीणों की जांच हुई। सिकल सेल जैसी बीमारियों की पहचान ने यह अहसास कराया कि आदिवासी समाज को अधिकारों के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति सजग होना भी उतना ही आवश्यक है।
प्रकृति से दूरी नहीं, सहजीवन का संदेश
प्रशिक्षकों ने आधुनिक उपभोक्तावादी सोच के खिलाफ आदिवासी प्रकृति-सम्मत जीवनशैली को विकल्प बताया। संदेश साफ था—
“प्रकृति बचेगी, तभी आदिवासी बचेगा; आदिवासी बचेगा, तभी समाज बचेगा।”
यह केंद्रीय प्रशिक्षण शिविर साबित करता है कि जब आदिवासी अस्मिता संविधान से संवाद करती है, तब न केवल जागरूकता पैदा होती है, बल्कि आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी समाज की नींव भी मजबूत होती है।

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