February 5, 2026

बसंत पंचमी पर विद्या का उत्सव या संवेदनहीनता?सरसींवा क्षेत्र में निजी विद्यालय के मनमाने निर्णय पर उठे सवाल

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1.न कोई शासकीय ऐच्छिक अवकाश, न सरस्वती पूजन ।
2.शिक्षा व्यवस्था की सोच पर गंभीर प्रश्न?
3.लोग इस तरह की हरकत को हिन्दू परम्पराओं की अहवेलना मानने विवश ।

  1. पूरा मामला हैप्पी पब्लिक स्कूल से जुड़ा हुआ ।

सारंगढ । भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और बौद्धिक चेतना का प्रतीक मानी जाती है। यह दिन माँ सरस्वती—विद्या, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी—की आराधना का विशेष अवसर होता है। सदियों से चली आ रही विद्यारंभ संस्कार की परंपरा इस बात का प्रतीक है कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि इसमें समाज को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने की शक्ति निहित है सरसींवा क्षेत्र के अधिकांश शासकीय एवं गैर-शासकीय विद्यालयों में बसंत पंचमी का पर्व इसी भावना के अनुरूप श्रद्धा, अनुशासन और उत्साह के साथ मनाया गया। विद्यालय परिसरों में सरस्वती पूजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कविता-पाठ, संगीत एवं विद्यार्थियों की सहभागिता के माध्यम से शिक्षा और संस्कृति के मूल्यों को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया गया । लेकिन इसी बीच सरसींवा से समीपस्थ पेंड्रावन में संचालित हैप्पी पब्लिक स्कूल का निर्णय क्षेत्र में गंभीर चर्चा और असंतोष का कारण बन गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उक्त निजी विद्यालय ने बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन अथवा किसी भी शैक्षणिक-सांस्कृतिक आयोजन के बजाय विद्यालय में अवकाश घोषित कर दिया। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बसंत पंचमी के दिन राज्य शासन द्वारा किसी भी प्रकार का शासकीय या ऐच्छिक अवकाश घोषित नहीं है। इसके बावजूद निजी विद्यालय द्वारा अवकाश देना न केवल नियमों की भावना के विपरीत प्रतीत होता है, बल्कि शिक्षा संस्थान की सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जहाँ स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों का कहना है कि इस विद्यालय में क्षेत्र के लगभग 500 से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं। ऐसे में विद्या की देवी के पूजन के इस पावन अवसर पर बच्चों को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के बजाय अवकाश देना, शिक्षा के व्यापक उद्देश्य को सीमित करने जैसा है। लोगों का स्पष्ट मत है कि विद्यालयों का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में संस्कार, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का विकास करना भी है।उक्त विद्यालय की इसतरह की हरकत को लोग अब हिन्दू धर्म,संस्कृति और परम्परा के विपरीत देख रहे है । उक्त मामले में जब विद्यालय प्रबंधन से पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो प्रबंधन का जवाब और भी चिंताजनक रहा। विद्यालय प्रमुख अरुण नाग द्वारा यह कहना कि इस दिन शासकीय ऐच्छिक अवकाश होता है ,और पालक व बच्चों की सरस्वती पूजन के पर्व बसंत पंचमी को लेकर विशेष रुचि नहीं है,पर्व में एक दो बार हमने कोशिश की थी पर बच्चे उपस्थित नही होते। इनका इस तरह का जवाब तथ्यों से परे और जिम्मेदारी से बचने वाला प्रतीत होता है। जब शासन द्वारा ऐसा कोई अवकाश घोषित ही नहीं है, तब इस तर्क का कोई औचित्य भी नहीं बनता। जिससे इस मामले को क्षेत्रवासी हिन्दू परम्पराओं की अवेहलना मानने विवश है। एक ओर जहां पूरे देश मे सरस्वती पूजन का यह पर्व बड़े उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है वही एक निजी विद्यालय द्वारा इस तरह की मनमानी पूर्ण रवैया कई तरह के प्रश्न खड़े करती है । क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि शिक्षा संस्थान ही सांस्कृतिक पर्वों के प्रति उदासीनता दिखाने लगें, तो आने वाली पीढ़ियों से परंपरा, आस्था और संस्कार कैसे जुड़े रहेंगे। यह स्थिति केवल एक विद्यालय का मामला नहीं, बल्कि निजी शिक्षा व्यवस्था की सोच और दिशा पर गंभीर विमर्श की मांग करती है। अब आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा विभाग और संबंधित प्रशासन ऐसे मामलों पर संज्ञान ले, ताकि विद्यालय केवल शैक्षणिक केंद्र न रहकर संस्कार, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी के संवाहक बने रहें। बसंत पंचमी जैसे पर्व पर दिखाई गई यह उदासीनता निश्चय ही सोचने पर मजबूर करती है कि क्या शिक्षा व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक रही है।

वर्सन –

बसंत पंचमी के दिन किसी प्रकार के शासकीय अथवा ऐच्छिक अवकाश की कोई जानकारी नहीं है। यदि किसी विद्यालय द्वारा सरस्वती पूजन जैसे पावन पर्व पर स्वेच्छा से या जबरन अवकाश दिया गया है, तो यह गंभीर विषय है। इस संबंध में तत्काल समन्वयक को मौके भेजकर जांच करवाता हूँ ।
– सत्यनारायण साहू,बीईओ बिलाईगढ़